Friday, June 11, 2010

उशाप्ररब्ध

डर की ताकत

देर रात चौकीदार
गश्त पर निकला है

इधर से उधर भड़भड़ाता फिर रहा
डण्डा और सीटी बजाता गश्त दे रहा

चौकीदार को घूमते देख
कुत्ते और तेज भौंक रहे

चौकीदार कुत्तों से सहमा-सहमा
कुत्ते तो कुत्ते ठहरे

कुत्तों से चौकीदार डर रहा
कुत्ते चौकीदार की लाठी से उधर

कुत्ते,लाठी,चौकीदार तीनों से
जिसे डरना था

तैनात रहा चौकीदार
तैनात रही लाठी और तो और

तैनात रहे घरों के लोग
इन सबसे जो डरा-डरा था

वह फिर भी
बच निकला था।
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चिड़िया और झील

सुबह जब पहली चिड़िया बोलती है
उसे सुनकर हमारी झील सुबह में
मन्द-मन्द मुस्कुराती है

हवाएं तरो-ताजा शीतल यहॉ
इसकी लहरों पर
मानिग दौड़ लगाती है

धवल बतखें ऐसे जैसे
कई सारे मोगरे खिलें हों

रथ दौड़ाते फिर सूरज चाचू जब
जमाने भर की भीड़ ले आते हैं यहॉ
शोर से किनारे भर जाया करते हैं

तब ना तो चिड़ियां की आवाज
झील को सुनाई पड़ती है और

ना ही बेचारी झील
चिड़िया के संग
मन्द-मन्द मुस्कुरा पाती है।
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