Friday, June 11, 2010

ऊषाप्रारब्ध

पुलिया

पुलिया के
नहीं होने की पीड़ा

कभी पूछो
उन रास्तों से

जिधर कोई दूर-दूर तक
पुलिया नहीं होती

उधर से गुजरते हुए कोई भी
घड़ी दो घड़ी वहॉ रुकना

सुस्ताना नहीं चाहता
पुलिया कभी किसी को

अकेला नहीं होने देती उससे
कोई करे ना करे पुलिया

सबसे संवाद करती है
दूर-दूर तक जहॉ-जिधर कोई

पुलिया नहीं होती वे रास्ते सूने-सूने
तन्हाई और थकान से सराबोर रहते हैं

यहॉ पंछियों-परिन्दों की तरह सब चहकते
साथ बैठते हैं सुख-दु:ख बॉटते-सुनाते

पुलिया तक आने वाले आपस में
ज्यादा समय तक अपरिचित नहीं रहते ।
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आवाजें

हमारे कौन होते हैं वे लोग जो हमें यूं
बरसों -बरस याद रह जाते

जाने क्यों
हर कभी याद आ जाते चेहरे वे ही आसपास के

कितनी आवाजें आसपास की बरसों पुरानी
जस की तस संवाद करती लगा करती है

कहॉ होगी वह ग्वालिन जो
दूर कहीं से चली आती थी मटकी लिए वह

गली- गली पुकारती घूमती
मही ले लो, दही ले लो ......

ये आवाजें हमारे आसपास हर रोज संवाद करती है
ये लोग गली-गली सुबहो-शाम हर कुछ लिए आते

घूम-घूमकर पुकारते रहते ये आवाजें
याद रह जाया करती है

क्यों हम बरसों बरस इन्हें भूल नहीं पाते जबकि
ये लोग हमारे कोई भी तो नहीं होते ।
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बड़े बाबू

घर से छूटे तो कहीं अटकते
घर-दफ्तर तक पूरा दिन ही

रहते बेचैन बड़े बाबू
कभी कहीं तो कभी किधर

हरेक कतार में लगे मिल
जाया करते बड़े बाबू

यारों संग बेचारे
पल-पल में दौड़े

इडली-सांभर कभी चाय-पकौड़े
वे क्या खाएं क्या छोड़े

सीट पर नज़र आए ना आए वे
चश्मा हरदम हाजरी देता है

बिन स्याही ज्यो पेन का होना
बिना बाबू कुछ भी ना होना

बगैर बाबू दिखे ये नमूना
साहेब सूनें दफ्तर भी सूना

रस-मलाई, बरफी,मक्खन-टिकिया,
पान-चूना क्या नहीं है बड़े बाबू ।

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