Monday, April 19, 2010

मैं फिर लौटूंगी

इस खूबसूरत दुनिया से
अन्तत: विदा होने का दिन
नहीं मालूम किसी को भी
कि कौन सा होगा समय
तिथि घड़ी वार मौसम
हो सकता है
गुलाबी ठण्ड हो
या मावठा बरस रहा हो
और मरघट की तमाम लकड़ियां
मना कर दें सुलगने से
हो सकता है
यह भी कि गर्मी तेज हो
तपतपाती धूप में
सिवा मेरे
सब ढूंढे ज़रा सी छांह
मुस्कराते हुए
अपनी ठण्डक में
सहेज लें का
वैसे मुझे तो वसन्त बेहद पसन्द है
झरा पत्ता ही सही
मैं फिर लहलहाने किसी टहनी पर
लौटूंगी पूरे हरेपन के साथ ।
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बेटी जा जन्म दिन
(बिट्टू के लिए)-एक मार्च
आज
उसका जन्म दिन है
और वह
घर से हजारों मील दूर
परदेश में
फोन एसएमएस
मोबाइल
कम्प्यूटरयुग
फिर भी उसे चाहिए
चिटि्ठयां जन्म दिन पर
हाथ की लिखी नेह भरी
ढेर सारी चिटि्ठयां
जिसमें आंगन का नीम
लदी हुई निम्बोलियां
स्कूल वाली सड़क
टेसू पलास के फूल
बौराया आम
कच्ची कैरियां
कूकती कोयल
सखी सहेलियां
पनघट की मुण्डेर
मिन्दरों के ओटले
बरगद पीपल
बैलगाड़ी की आड़ में
छुपा छुपी का शोर
गली मुहाने
अड़ोस-पड़ोस
घर-आंगन
छोटू की खटर-पटर
बछडी और गाय का रंभाना
मिस्जद से गूंजती अजान
उसे नहीं चाहिए
एसएमएस ई-मेल
टेलीफोन ग्रीटिंग्स
उसे चाहिए
पूरी धरती
हाथ की लिखी चिट्ठी में ।

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