शून्य की कैद में
पिता,अक्सर सुनाया करते यह कि
उनके समय में
पिता-पुत्र के
सीधे संवाद की परम्परा नहीं थी चलन में,
उन दिनों असम्भव हुआ करता था
पिता के आग मुंह खोलना
मां,बुआ,दादी के जरिए जैसे-तैसे
अपनी बात कह पाते
पिता के कटघरे में जाते हजुए कंपकंपा जाते ।
थरथराते,पसीना पोंछते,बामुश्किल कहते कुछ का कुछ
शब्द जैसे ओठों में ही अटके रह जाते
इतना कायदा अब कहां बेटों की कचहरी
कटघरे में वर्तमान और भविष्य र्षोर्षो दलीलें,दलालों,खारिज
अपीलों का बोझ लिए
अपने ही शून्य में कैद
पिता ही पिता ।
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बागड़ की
बेलें
छुईमुई नहीं,ये
लरजता गुलाब भी नहीं
बागड़ की बेलें है छैल छबीलियां
ये आदिवासी रूपसियां
खेतों खलिहानों मेड़ों बीहड़ों
कुंआ-बावड़ी गारा गोबर गिट्टी मिट्टी
सुबह से सांझ तक ये चकरघिन्नियां
सूरज के चेहरे पर
गोधुली के उजास सी
बागड़-बागड़ लहराती बेलें है ये
चिलचिलाती धूप में नर्म दुर्वा है
लोक धुनों की गमक
हंसिए की चमक
महुआ सी मादक
खट्टी मिट्टी ईमलियां करौन्दे जामुन गूलर
कच्ची केरियों सी ये छोरियां
सपने बुनते सलौनियां ।
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बड़े बाबू
घर से छूटे तो कहीं अटकते रहते
घर दफ्तर तक पूरा दिन
रहते बेचैन बड़े बाबू
कभी कहीं तो कभी किधर
हरेक कतार में लगते मिलते
बड़े बाबू
यारों संग बेचारे
पल पल मे दौड़े
इडली,संाभर कहीं चाय पकौडे़ वे
क्या-क्या खाएं क्या-क्या छोड़े र्षोर्षो
सीट पर नज़र आएं ना आएं हरदम
चश्मा उनकी हाजरी देता है
बिन स्याही ज्यौं पेन का होना
बिन बाबू कुछ भी ना होना
बगैर बाबू दिखता यही नमूना
साहेब सूने दफ्तर भी सूना
रस मलाई बरफी मक्खन टिकिया
पान चूना क्या नहीं है बड़े बाबू
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नया गुड़
पिता कभी
जब गरमी के दिनों
पोटली में पके-पके आम,केरियों,गन्ने की बनी राब
ताजी रसाल,होला,उम्बी,नया गुड़ होता था
नए गुड़ और सलाल के चावलों लड्डुओं की
हमें ही नहीं हमारे शहरी
अड़ौस-पड़ौस को भी
बेसब्री से प्रतीक्षा रहा करती
बारिश आते ही बोरियां भर भर कांधे पर वे
काकडी-भुट्टे लाया करते थे पिता तब की तरह
होला,उम्बी,केरियां आम काकड़ी भुट्टे और
मीठे ताजे गुड़ की भेली नहीं, अब वे
डाक से मिली लाचारी भरी चिट्ठी लगते हैं
जिसे पढ़ने की यहां अब किसी कोफुर्सत नहीं ।
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Monday, May 10, 2010
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