पेड़ बनने की उम्मीद
चिलचिलाती धूप में
छायादार बनी स्मृति
पुश्तैनी मकान की
खण्डहर जमीन
एक ढेले में दबी गुमठी से
फूटती हुई कोंपलें
जिसकी उंगली थामें
चली जाती हूं अतीत में
घने आम के नीचे
मुझे दुलार रही थी बड़ी बहन
फूटे पीपे से पानी ढो रहे पिता
डनकी लट्ठेदार बनियान अब भी
सूखी नहीं
उसमें गीलेपन की महक बाकी थी ।
मां ने अभी अभी
लीपी थी भीत
पिता तोड़ेंगे आम
मुरझाई कोंपल में
बाकी है
पेड़ बनने की उम्मीद
एक गिलास पानी
उढेल देती है
कोंपल पर ।
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टेबल फैन
पुराने टेबल फैन की हवा ने भरी दोपहरी
उलट दिए पन्ने पुरानी डायरी के पीले-पीले से
हरेक पन्ने पर दर्ज थी कई सारी खुशियां छोटी छोटी सी
पगार के नपे तुले बजट में से किसी तरह बचा बचाकर
घर में कुछ ना कुछ खरीद लाने मसलन,किसी गरमी
एक अद्द टेबल फैन घर ले आने की बड़ी बेहदखुशी
कितनी बड़ी थी बिट्टू का पहला दान्त उग आने
डसके पहली बार खड़ी होने तुतलाने कभी हमसे
आइस्क्रीम फुग्गे चाकलेट की जिद में रूठ जाने
बच्चों को तरह तरह जतनों से मनाने की खुशी
आसपारस ही कहीं सैर सपाटे को दिनों दोहराते हुए
सबको बात बात में बताने की खुशी
भरी भीड़ टाकीज की लाईन में जैसे तैसे
पिक्चर का टिकिट मिल जाने की खुशी जाने कहां र्षोर्षो
दुनियादारी के पतझड़,सावन,वसन्त बहारों की खुशियां
डायरी के धूंधलके पन्ने दर पन्नेदर्ज रह गई
भूली बिसरी गुमशुदा कई सारीवे हमसे बहुत दूर
कहां गुम हुई कहां तलाशे खुशियां बेहद छोटी छोटी
सी खुशियां कहां गई
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पेड़
सुहागिनें युगों से
पेड़ को पूज रही
सूत लपेट रही मन्नते मांगते
उससे कोई अपनी अपनी
व्यथाएं सुना रही
पेड को नहीं पता कि सदियों से
आखिर उसमें विराजते भगवान कौन से
स्त्रियों के लिए पेड़ भगवान है
छुपा छुपी खेल रहे बच्चां के लिए
छुपने छुपाने की जगह और कितने सारे
पक्षियों का आसरा भी बसेरा भी है पेड़
सदियों से पेड़ किसी भगवान के लिए नहीं
पूजती सूत लपेटती स्त्रियों इतने इन नन्हे
छुपा छुपी खलते बच्चों
आसरा बनाते पक्षियों और
झूला झूलती बेटियों के लिए बांहे फैलाएं ये
पेड़ सदियों से इन सबके लिए ही धरती पर हरे है ।
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Saturday, April 10, 2010
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झूला झूलती बेटियों के लिए बांहे फैलाएं ये
ReplyDeleteपेड़ सदियों से इन सबके लिए ही धरती पर हरे है ।
इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....