शून्य की कैद में
पिता,अक्सर सुनाया करते यह कि
उनके समय में
पिता-पुत्र के
सीधे संवाद की परम्परा नहीं थी चलन में,
उन दिनों असम्भव हुआ करता था
पिता के आग मुंह खोलना
मां,बुआ,दादी के जरिए जैसे-तैसे
अपनी बात कह पाते
पिता के कटघरे में जाते हजुए कंपकंपा जाते ।
थरथराते,पसीना पोंछते,बामुश्किल कहते कुछ का कुछ
शब्द जैसे ओठों में ही अटके रह जाते
इतना कायदा अब कहां बेटों की कचहरी
कटघरे में वर्तमान और भविष्य र्षोर्षो दलीलें,दलालों,खारिज
अपीलों का बोझ लिए
अपने ही शून्य में कैद
पिता ही पिता ।
0
बागड़ की
बेलें
छुईमुई नहीं,ये
लरजता गुलाब भी नहीं
बागड़ की बेलें है छैल छबीलियां
ये आदिवासी रूपसियां
खेतों खलिहानों मेड़ों बीहड़ों
कुंआ-बावड़ी गारा गोबर गिट्टी मिट्टी
सुबह से सांझ तक ये चकरघिन्नियां
सूरज के चेहरे पर
गोधुली के उजास सी
बागड़-बागड़ लहराती बेलें है ये
चिलचिलाती धूप में नर्म दुर्वा है
लोक धुनों की गमक
हंसिए की चमक
महुआ सी मादक
खट्टी मिट्टी ईमलियां करौन्दे जामुन गूलर
कच्ची केरियों सी ये छोरियां
सपने बुनते सलौनियां ।
0
बड़े बाबू
घर से छूटे तो कहीं अटकते रहते
घर दफ्तर तक पूरा दिन
रहते बेचैन बड़े बाबू
कभी कहीं तो कभी किधर
हरेक कतार में लगते मिलते
बड़े बाबू
यारों संग बेचारे
पल पल मे दौड़े
इडली,संाभर कहीं चाय पकौडे़ वे
क्या-क्या खाएं क्या-क्या छोड़े र्षोर्षो
सीट पर नज़र आएं ना आएं हरदम
चश्मा उनकी हाजरी देता है
बिन स्याही ज्यौं पेन का होना
बिन बाबू कुछ भी ना होना
बगैर बाबू दिखता यही नमूना
साहेब सूने दफ्तर भी सूना
रस मलाई बरफी मक्खन टिकिया
पान चूना क्या नहीं है बड़े बाबू
0
नया गुड़
पिता कभी
जब गरमी के दिनों
पोटली में पके-पके आम,केरियों,गन्ने की बनी राब
ताजी रसाल,होला,उम्बी,नया गुड़ होता था
नए गुड़ और सलाल के चावलों लड्डुओं की
हमें ही नहीं हमारे शहरी
अड़ौस-पड़ौस को भी
बेसब्री से प्रतीक्षा रहा करती
बारिश आते ही बोरियां भर भर कांधे पर वे
काकडी-भुट्टे लाया करते थे पिता तब की तरह
होला,उम्बी,केरियां आम काकड़ी भुट्टे और
मीठे ताजे गुड़ की भेली नहीं, अब वे
डाक से मिली लाचारी भरी चिट्ठी लगते हैं
जिसे पढ़ने की यहां अब किसी कोफुर्सत नहीं ।
0
Monday, May 10, 2010
Monday, April 19, 2010
मैं फिर लौटूंगी
इस खूबसूरत दुनिया से
अन्तत: विदा होने का दिन
नहीं मालूम किसी को भी
कि कौन सा होगा समय
तिथि घड़ी वार मौसम
हो सकता है
गुलाबी ठण्ड हो
या मावठा बरस रहा हो
और मरघट की तमाम लकड़ियां
मना कर दें सुलगने से
हो सकता है
यह भी कि गर्मी तेज हो
तपतपाती धूप में
सिवा मेरे
सब ढूंढे ज़रा सी छांह
मुस्कराते हुए
अपनी ठण्डक में
सहेज लें का
वैसे मुझे तो वसन्त बेहद पसन्द है
झरा पत्ता ही सही
मैं फिर लहलहाने किसी टहनी पर
लौटूंगी पूरे हरेपन के साथ ।
0
बेटी जा जन्म दिन
(बिट्टू के लिए)-एक मार्च
आज
उसका जन्म दिन है
और वह
घर से हजारों मील दूर
परदेश में
फोन एसएमएस
मोबाइल
कम्प्यूटरयुग
फिर भी उसे चाहिए
चिटि्ठयां जन्म दिन पर
हाथ की लिखी नेह भरी
ढेर सारी चिटि्ठयां
जिसमें आंगन का नीम
लदी हुई निम्बोलियां
स्कूल वाली सड़क
टेसू पलास के फूल
बौराया आम
कच्ची कैरियां
कूकती कोयल
सखी सहेलियां
पनघट की मुण्डेर
मिन्दरों के ओटले
बरगद पीपल
बैलगाड़ी की आड़ में
छुपा छुपी का शोर
गली मुहाने
अड़ोस-पड़ोस
घर-आंगन
छोटू की खटर-पटर
बछडी और गाय का रंभाना
मिस्जद से गूंजती अजान
उसे नहीं चाहिए
एसएमएस ई-मेल
टेलीफोन ग्रीटिंग्स
उसे चाहिए
पूरी धरती
हाथ की लिखी चिट्ठी में ।
अन्तत: विदा होने का दिन
नहीं मालूम किसी को भी
कि कौन सा होगा समय
तिथि घड़ी वार मौसम
हो सकता है
गुलाबी ठण्ड हो
या मावठा बरस रहा हो
और मरघट की तमाम लकड़ियां
मना कर दें सुलगने से
हो सकता है
यह भी कि गर्मी तेज हो
तपतपाती धूप में
सिवा मेरे
सब ढूंढे ज़रा सी छांह
मुस्कराते हुए
अपनी ठण्डक में
सहेज लें का
वैसे मुझे तो वसन्त बेहद पसन्द है
झरा पत्ता ही सही
मैं फिर लहलहाने किसी टहनी पर
लौटूंगी पूरे हरेपन के साथ ।
0
बेटी जा जन्म दिन
(बिट्टू के लिए)-एक मार्च
आज
उसका जन्म दिन है
और वह
घर से हजारों मील दूर
परदेश में
फोन एसएमएस
मोबाइल
कम्प्यूटरयुग
फिर भी उसे चाहिए
चिटि्ठयां जन्म दिन पर
हाथ की लिखी नेह भरी
ढेर सारी चिटि्ठयां
जिसमें आंगन का नीम
लदी हुई निम्बोलियां
स्कूल वाली सड़क
टेसू पलास के फूल
बौराया आम
कच्ची कैरियां
कूकती कोयल
सखी सहेलियां
पनघट की मुण्डेर
मिन्दरों के ओटले
बरगद पीपल
बैलगाड़ी की आड़ में
छुपा छुपी का शोर
गली मुहाने
अड़ोस-पड़ोस
घर-आंगन
छोटू की खटर-पटर
बछडी और गाय का रंभाना
मिस्जद से गूंजती अजान
उसे नहीं चाहिए
एसएमएस ई-मेल
टेलीफोन ग्रीटिंग्स
उसे चाहिए
पूरी धरती
हाथ की लिखी चिट्ठी में ।
Saturday, April 10, 2010
कविताएं
पेड़ बनने की उम्मीद
चिलचिलाती धूप में
छायादार बनी स्मृति
पुश्तैनी मकान की
खण्डहर जमीन
एक ढेले में दबी गुमठी से
फूटती हुई कोंपलें
जिसकी उंगली थामें
चली जाती हूं अतीत में
घने आम के नीचे
मुझे दुलार रही थी बड़ी बहन
फूटे पीपे से पानी ढो रहे पिता
डनकी लट्ठेदार बनियान अब भी
सूखी नहीं
उसमें गीलेपन की महक बाकी थी ।
मां ने अभी अभी
लीपी थी भीत
पिता तोड़ेंगे आम
मुरझाई कोंपल में
बाकी है
पेड़ बनने की उम्मीद
एक गिलास पानी
उढेल देती है
कोंपल पर ।
0
टेबल फैन
पुराने टेबल फैन की हवा ने भरी दोपहरी
उलट दिए पन्ने पुरानी डायरी के पीले-पीले से
हरेक पन्ने पर दर्ज थी कई सारी खुशियां छोटी छोटी सी
पगार के नपे तुले बजट में से किसी तरह बचा बचाकर
घर में कुछ ना कुछ खरीद लाने मसलन,किसी गरमी
एक अद्द टेबल फैन घर ले आने की बड़ी बेहदखुशी
कितनी बड़ी थी बिट्टू का पहला दान्त उग आने
डसके पहली बार खड़ी होने तुतलाने कभी हमसे
आइस्क्रीम फुग्गे चाकलेट की जिद में रूठ जाने
बच्चों को तरह तरह जतनों से मनाने की खुशी
आसपारस ही कहीं सैर सपाटे को दिनों दोहराते हुए
सबको बात बात में बताने की खुशी
भरी भीड़ टाकीज की लाईन में जैसे तैसे
पिक्चर का टिकिट मिल जाने की खुशी जाने कहां र्षोर्षो
दुनियादारी के पतझड़,सावन,वसन्त बहारों की खुशियां
डायरी के धूंधलके पन्ने दर पन्नेदर्ज रह गई
भूली बिसरी गुमशुदा कई सारीवे हमसे बहुत दूर
कहां गुम हुई कहां तलाशे खुशियां बेहद छोटी छोटी
सी खुशियां कहां गई
0
पेड़
सुहागिनें युगों से
पेड़ को पूज रही
सूत लपेट रही मन्नते मांगते
उससे कोई अपनी अपनी
व्यथाएं सुना रही
पेड को नहीं पता कि सदियों से
आखिर उसमें विराजते भगवान कौन से
स्त्रियों के लिए पेड़ भगवान है
छुपा छुपी खेल रहे बच्चां के लिए
छुपने छुपाने की जगह और कितने सारे
पक्षियों का आसरा भी बसेरा भी है पेड़
सदियों से पेड़ किसी भगवान के लिए नहीं
पूजती सूत लपेटती स्त्रियों इतने इन नन्हे
छुपा छुपी खलते बच्चों
आसरा बनाते पक्षियों और
झूला झूलती बेटियों के लिए बांहे फैलाएं ये
पेड़ सदियों से इन सबके लिए ही धरती पर हरे है ।
00
चिलचिलाती धूप में
छायादार बनी स्मृति
पुश्तैनी मकान की
खण्डहर जमीन
एक ढेले में दबी गुमठी से
फूटती हुई कोंपलें
जिसकी उंगली थामें
चली जाती हूं अतीत में
घने आम के नीचे
मुझे दुलार रही थी बड़ी बहन
फूटे पीपे से पानी ढो रहे पिता
डनकी लट्ठेदार बनियान अब भी
सूखी नहीं
उसमें गीलेपन की महक बाकी थी ।
मां ने अभी अभी
लीपी थी भीत
पिता तोड़ेंगे आम
मुरझाई कोंपल में
बाकी है
पेड़ बनने की उम्मीद
एक गिलास पानी
उढेल देती है
कोंपल पर ।
0
टेबल फैन
पुराने टेबल फैन की हवा ने भरी दोपहरी
उलट दिए पन्ने पुरानी डायरी के पीले-पीले से
हरेक पन्ने पर दर्ज थी कई सारी खुशियां छोटी छोटी सी
पगार के नपे तुले बजट में से किसी तरह बचा बचाकर
घर में कुछ ना कुछ खरीद लाने मसलन,किसी गरमी
एक अद्द टेबल फैन घर ले आने की बड़ी बेहदखुशी
कितनी बड़ी थी बिट्टू का पहला दान्त उग आने
डसके पहली बार खड़ी होने तुतलाने कभी हमसे
आइस्क्रीम फुग्गे चाकलेट की जिद में रूठ जाने
बच्चों को तरह तरह जतनों से मनाने की खुशी
आसपारस ही कहीं सैर सपाटे को दिनों दोहराते हुए
सबको बात बात में बताने की खुशी
भरी भीड़ टाकीज की लाईन में जैसे तैसे
पिक्चर का टिकिट मिल जाने की खुशी जाने कहां र्षोर्षो
दुनियादारी के पतझड़,सावन,वसन्त बहारों की खुशियां
डायरी के धूंधलके पन्ने दर पन्नेदर्ज रह गई
भूली बिसरी गुमशुदा कई सारीवे हमसे बहुत दूर
कहां गुम हुई कहां तलाशे खुशियां बेहद छोटी छोटी
सी खुशियां कहां गई
0
पेड़
सुहागिनें युगों से
पेड़ को पूज रही
सूत लपेट रही मन्नते मांगते
उससे कोई अपनी अपनी
व्यथाएं सुना रही
पेड को नहीं पता कि सदियों से
आखिर उसमें विराजते भगवान कौन से
स्त्रियों के लिए पेड़ भगवान है
छुपा छुपी खेल रहे बच्चां के लिए
छुपने छुपाने की जगह और कितने सारे
पक्षियों का आसरा भी बसेरा भी है पेड़
सदियों से पेड़ किसी भगवान के लिए नहीं
पूजती सूत लपेटती स्त्रियों इतने इन नन्हे
छुपा छुपी खलते बच्चों
आसरा बनाते पक्षियों और
झूला झूलती बेटियों के लिए बांहे फैलाएं ये
पेड़ सदियों से इन सबके लिए ही धरती पर हरे है ।
00
कविताएं
उसूल
जब भी
झपटना हो
रंग बदल लेता है
गिरगिट
झपटती है छिपकली
चुपके से
पशु की तरह ही पशु
बेकटके
करते है
उजाड़
कुछ भी मनुष्य जैसा
मनुष्य में आचरण क्यो
तय नहीं
0
उस मकान में
उस मकान में
अभी अभी वह औरत
रहने आयी है
कभी घुप्प अंधेरा रहा करता थ
उसमें अब रोशनी
रहा करती है ।
जब भी
झपटना हो
रंग बदल लेता है
गिरगिट
झपटती है छिपकली
चुपके से
पशु की तरह ही पशु
बेकटके
करते है
उजाड़
कुछ भी मनुष्य जैसा
मनुष्य में आचरण क्यो
तय नहीं
0
उस मकान में
उस मकान में
अभी अभी वह औरत
रहने आयी है
कभी घुप्प अंधेरा रहा करता थ
उसमें अब रोशनी
रहा करती है ।
कविताएं
मिनी बसें
चलो,रोशनपुरा,रंगमहल,लिली,विट्ठल,
हमीदिया,दस,ग्यारह,ग्यारहसौ
रोक्को...हां अम्मा जरा चढ़ना जल्दी जल्दी
संभल के बहनजी
चलो बढ़ाओ
आईए अंकल,बढ़ना मैडमजी,बाबूजी
खुल्ले निकालना...ये लेना बाकी के
मुन्ना बैठना,आंटीजी,भैया जी दबना
छंटाक-छंटाकभर
बच्चों को गोद में लेना जी
हां भैयाफटाफटा निकालना
रोक्को...रोक्को
झीलों से सजे नवाबों के इस ‘शहर में
घोड़ागाड़ी कहां अब
सवेरे से सांझ तक धड़धड़ाती दौड़ती
बड़ी-बड़ी व्यवस्थाओं के बीच वहां
अपनी ही ‘शान से
हर सबके को जोड़ती मिनी बसें ।
00
सबेरा होने पर
कहां कहां से निकल पड़ते दूर कहीं भी जूझते
दो जून की रोटी के लिए ये मेहनकश बेचारे
दिन भर की मेहनत के बाद दो घड़ी कहीं
नीन्द में उतरे ही थे कि रात गए
आततायी की बन्दूकों से धड़ाधड़
दाग दिए गए बेगुनाह कई
स्तब्ध आकाश चान्द भी चुप
पछी सहमे सहमे सोच रहे रात जागकर
सुबह में कैसे चहचहाएंगे वे और
खून से लथपथ इन बेगुनाहों से
कैसे कहेंगे चहचहा-चहचहाकर भई उठो भी
उठो उठो कि सवेरा हुआ ।
चलो,रोशनपुरा,रंगमहल,लिली,विट्ठल,
हमीदिया,दस,ग्यारह,ग्यारहसौ
रोक्को...हां अम्मा जरा चढ़ना जल्दी जल्दी
संभल के बहनजी
चलो बढ़ाओ
आईए अंकल,बढ़ना मैडमजी,बाबूजी
खुल्ले निकालना...ये लेना बाकी के
मुन्ना बैठना,आंटीजी,भैया जी दबना
छंटाक-छंटाकभर
बच्चों को गोद में लेना जी
हां भैयाफटाफटा निकालना
रोक्को...रोक्को
झीलों से सजे नवाबों के इस ‘शहर में
घोड़ागाड़ी कहां अब
सवेरे से सांझ तक धड़धड़ाती दौड़ती
बड़ी-बड़ी व्यवस्थाओं के बीच वहां
अपनी ही ‘शान से
हर सबके को जोड़ती मिनी बसें ।
00
सबेरा होने पर
कहां कहां से निकल पड़ते दूर कहीं भी जूझते
दो जून की रोटी के लिए ये मेहनकश बेचारे
दिन भर की मेहनत के बाद दो घड़ी कहीं
नीन्द में उतरे ही थे कि रात गए
आततायी की बन्दूकों से धड़ाधड़
दाग दिए गए बेगुनाह कई
स्तब्ध आकाश चान्द भी चुप
पछी सहमे सहमे सोच रहे रात जागकर
सुबह में कैसे चहचहाएंगे वे और
खून से लथपथ इन बेगुनाहों से
कैसे कहेंगे चहचहा-चहचहाकर भई उठो भी
उठो उठो कि सवेरा हुआ ।
Wednesday, February 24, 2010
उषा प्रारब्ध की कविताएं..
कुछ देर ठहर जाना चाहती हूं
मैं ठहर जाना चाहती हूं फूल-फूल महकने और
पराग की तरह बिखर-बिखर जाने के लिए
फुदकती गिलहरी के हाथों कहां-कहां तक मैं
बिखर जाना चाहती हूं दाना-दाना यहां-वहां
हर-हरा कर उग आना चाहती हूं फिर-फिर
घुल-घुल जाना चाहती हूं,फांगुनी चटख रंगों में
गेन्दा,टेसू,पीली-पीली सरसों में और
खिल-खिल जाना चाहती हूं कहीं भी
उन मैले-कुचैले बदरंग चेहरों में जो
जिन्दगी की परवाह किए बगैर हर वक्त
कचरे के बदबूदार ढेरों को खंगालते रहते
कुछ मिल ना मिले कभी मुरझाते नहीं जुटे रहते
धूल भरे खिल-खिलाते कोपनहेगन को ठेंगा दिखलाते
इन चेहरों पर
बूंद भर पसीने की तरह कुछ देर
ठहर जाना चाहती हूं ।
नाव
सदियों से तुम्हारी खिलखिलाहट हूं मैं
चप्पू के इशारों पर चलती फकत मूक
नाव नहीं हूं कल-कल बहती हुई रूपसी नदी
उदास मत होना
तुम्हारे चेहरे की चिरयुवा
मुस्कान हूं मैं नाव
हर पल तैरती रहती हूं लहर-लहर पर
सदियों से मांझी ने कोरस में गुनगुनाया मुझे ही
गाथाएं सुनाते इन किनारों के बीच बहती
लहर-लहर पर थिरकती
तुम्हारे चेहरे की जीवन्त जादुई
मुस्कान हूं नदी मुझे उदास कर देती है
तुम्हारा सूख जाना जैसे
स्त्री का बूढ़ा जाना और उसके
टूटे दांत की तरह कहीं बदहाल
पड़ी रह जाती हूं मै फकत काठ की नाव नहीं हूं
लहर-लहर लहराती नदी
मै तुम्हारा चेहरा हूं,अभिव्यक्ति हूं,बयान हूं
सदियों से तुम्हारी खिलखिलाहट हूं कल-कल गूंजती
तुम्हारे लहरों पर
तैरती मुस्कान मैं नाव हूं ।
पर्व स्नान
कई सारी नदियों का
पवित्र जल मां ने
शीशियों-बाटलों में
सहेज रखा है
बुढ़ापे से विवश हब वे पर्वों पर
कहीं तीर्थों,सरोवरों,नदियों,संगमों तक अक्सर
जा नहीं पाती ऐसे में घर पर ही
बाल्टी के पानी में ढंकना भर पवित्र जल यूं
उढ़ेल लिया करती है उन्हें भरोसा है कि उनके लिए
गंगा,यमुना,गोमती,गोदावरी,बेतवा,पारवती,क्षिप्रा,
नर्मदा,कांवेरी,सरस्वती,आवाहन करते ही
नदियां सबकी सब दौड़ी चली आएगी बाल्टी में ।
00
मित्रता
शाख-शाख कटीला बेर
फलों से लटालूम रहता
स्वस्तुति में सदैव इतराता रहता हर कभी
मैं तुमसे ज्यादा घना और फलदार इतना किक देखो
शाख-शाख झुकी जा रही
सीताफल बेहद विनम्रता से समझाता है कि मित्र
सुनो तो,
मेरा एक ही फल अत्यन्त तृप्तिदायक रहता है
मिठास से भरा सीताफल जो खाए तो
खाता ही रह जाए कुदरत का लडड्ू गोल-मटोल सा
तुम्हारे खटास भरे बेर फल प्रशंसित तो कभी-कभार
यदा-कदा ही होते है और ये
तुम्हारी कष्टदायक कटीली शाखें फैलाते ही कई बार
बैरहमी से काट दी जाती है
इनके अनगिनत सारे इतने
ये कांटे खुद तो बच जाते हैं लोगों से पर
मेर भाई फलों को तोड़ने
पत्थर तुम्ही खिलवाते
यह तुम्हारी दुर्दशा देखी नहीं जाती
इतना सब सुनते ही बेर सोच में डूब गया कि
यह वाकई में मुझसे
सच ही तो कह रहा है तभी सीताफल आत्मीयता से
मीठी मुस्कान बिखेरते हुए समझाता है कि मित्र
तुम जैसे भी हो मेरे प्रिय हो,और कभी भी
मित्रता में ना तो कांटे गिनना चाहिए,ना ही
फल अथवा प्रतिफलमित्रता ऐसी ही शाश्वत होती है ।
मैं ठहर जाना चाहती हूं फूल-फूल महकने और
पराग की तरह बिखर-बिखर जाने के लिए
फुदकती गिलहरी के हाथों कहां-कहां तक मैं
बिखर जाना चाहती हूं दाना-दाना यहां-वहां
हर-हरा कर उग आना चाहती हूं फिर-फिर
घुल-घुल जाना चाहती हूं,फांगुनी चटख रंगों में
गेन्दा,टेसू,पीली-पीली सरसों में और
खिल-खिल जाना चाहती हूं कहीं भी
उन मैले-कुचैले बदरंग चेहरों में जो
जिन्दगी की परवाह किए बगैर हर वक्त
कचरे के बदबूदार ढेरों को खंगालते रहते
कुछ मिल ना मिले कभी मुरझाते नहीं जुटे रहते
धूल भरे खिल-खिलाते कोपनहेगन को ठेंगा दिखलाते
इन चेहरों पर
बूंद भर पसीने की तरह कुछ देर
ठहर जाना चाहती हूं ।
नाव
सदियों से तुम्हारी खिलखिलाहट हूं मैं
चप्पू के इशारों पर चलती फकत मूक
नाव नहीं हूं कल-कल बहती हुई रूपसी नदी
उदास मत होना
तुम्हारे चेहरे की चिरयुवा
मुस्कान हूं मैं नाव
हर पल तैरती रहती हूं लहर-लहर पर
सदियों से मांझी ने कोरस में गुनगुनाया मुझे ही
गाथाएं सुनाते इन किनारों के बीच बहती
लहर-लहर पर थिरकती
तुम्हारे चेहरे की जीवन्त जादुई
मुस्कान हूं नदी मुझे उदास कर देती है
तुम्हारा सूख जाना जैसे
स्त्री का बूढ़ा जाना और उसके
टूटे दांत की तरह कहीं बदहाल
पड़ी रह जाती हूं मै फकत काठ की नाव नहीं हूं
लहर-लहर लहराती नदी
मै तुम्हारा चेहरा हूं,अभिव्यक्ति हूं,बयान हूं
सदियों से तुम्हारी खिलखिलाहट हूं कल-कल गूंजती
तुम्हारे लहरों पर
तैरती मुस्कान मैं नाव हूं ।
पर्व स्नान
कई सारी नदियों का
पवित्र जल मां ने
शीशियों-बाटलों में
सहेज रखा है
बुढ़ापे से विवश हब वे पर्वों पर
कहीं तीर्थों,सरोवरों,नदियों,संगमों तक अक्सर
जा नहीं पाती ऐसे में घर पर ही
बाल्टी के पानी में ढंकना भर पवित्र जल यूं
उढ़ेल लिया करती है उन्हें भरोसा है कि उनके लिए
गंगा,यमुना,गोमती,गोदावरी,बेतवा,पारवती,क्षिप्रा,
नर्मदा,कांवेरी,सरस्वती,आवाहन करते ही
नदियां सबकी सब दौड़ी चली आएगी बाल्टी में ।
00
मित्रता
शाख-शाख कटीला बेर
फलों से लटालूम रहता
स्वस्तुति में सदैव इतराता रहता हर कभी
मैं तुमसे ज्यादा घना और फलदार इतना किक देखो
शाख-शाख झुकी जा रही
सीताफल बेहद विनम्रता से समझाता है कि मित्र
सुनो तो,
मेरा एक ही फल अत्यन्त तृप्तिदायक रहता है
मिठास से भरा सीताफल जो खाए तो
खाता ही रह जाए कुदरत का लडड्ू गोल-मटोल सा
तुम्हारे खटास भरे बेर फल प्रशंसित तो कभी-कभार
यदा-कदा ही होते है और ये
तुम्हारी कष्टदायक कटीली शाखें फैलाते ही कई बार
बैरहमी से काट दी जाती है
इनके अनगिनत सारे इतने
ये कांटे खुद तो बच जाते हैं लोगों से पर
मेर भाई फलों को तोड़ने
पत्थर तुम्ही खिलवाते
यह तुम्हारी दुर्दशा देखी नहीं जाती
इतना सब सुनते ही बेर सोच में डूब गया कि
यह वाकई में मुझसे
सच ही तो कह रहा है तभी सीताफल आत्मीयता से
मीठी मुस्कान बिखेरते हुए समझाता है कि मित्र
तुम जैसे भी हो मेरे प्रिय हो,और कभी भी
मित्रता में ना तो कांटे गिनना चाहिए,ना ही
फल अथवा प्रतिफलमित्रता ऐसी ही शाश्वत होती है ।
Friday, December 11, 2009
सीपियां
सीपियों सी
अनमोल आँखे
जिनमें सपने
आकार लेते हैं
बचपन,जवानी,बुढ़ापा
ढेरों उम्मीदें
आँखों में मोतियों सा
पानीदार है जीवन
ये समन्दर है
महासागर है ज्वार-भाटे इनमें
छलकते प्योले
आंधी-तूफान
ताल तलैया झीलें झरने
अविरल बहती नदियां
सहज,सरल,सौम्य,सरस,अथाह
आशाएं संभावनाएं
जिन्दगी के घाट-घाट भटकते मिली
सूखें कुओं सी पथराई आँखे ।
0
सुबह सबेरे
सूरज की पहली
किरण के साथ
पोटलियां चल पड़ी
रोटियां लिए
गिटिट्यां फोड़ने
पत्थरों को ढोने
खेतों को हांकने बखरने
इन्द्रधनुष को उतारती
लहराती उनकी
ओढ़नियां हवा में
जंगलों में झरना बन अपनी
हंसी से गुंजाती
दूर-दूर बिखर गई
पोटलियां ही पोटलियां
धरती से आसमान तक महकी
रोटियां ही रोटियां ।
0
बिंदिया से शुरू होती...सुबह
सुबह उठते ही वहश्
आईने में अपनी बिंदिया को
निहारती है कहीं
इधर उधर तो नहीं हुई र्षोर्षो
हौले से उसे संवारती चिपकाती
ललाट पर
हो न हो बिंदिया जरूरी है...
केशर चंदन कुमकुम हल्दी
कुछ भी सही मिले न मिले
बिंदिया का कोई न कोई
विकल्प खोज लेती है
स्त्रियों की सबह सूरज से नहीं
बिंदिया से शुरू होती है ।
0
करिश्मा,कालोल दिखना चाहती लड़की
करिश्मा,काजोल
उर्मिला दिखना चाहती
आज हर लड़की
मिलती जुलती हो सकती है
किसी की शक्ल
करिश्मा,काजोल
ऐश्वर्या से मिलती जुलती
हो सकती है आंखें
मुस्कराहट महिमा
सोचती है लड़की
हो न हो उसे रवीना
लगना ही चाहिए ।
कुछ नहीं तो मीना,टीना
हीना,ट्रिंक्कल
बबीता तो जरूर
लगना चाहिए उसे ।
जो है वह नहीं
दिखना चाहती लड़की ।
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स्वाद
समय के साथ
चीजों के मायने
अक्सर बदल जाते हैं
पत्थरों को रगड़ते घिसते
आदम को
समझ में आए थे
शाश्वत भूख में
स्वाद के भी मायने
समय के साथ
बदल गए
स्वाद रोटी की जगह
उतर आया
सिक्कों मे
नहीं जान सकता था आदम
मचेंगे कोहराम
छिडें़गे युद्ध
स्वाद की खातिर
उतर आएंगे विध्वंस पर ।
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खानाबदोश स्त्रियां
कलाई से बाजुओं तक
कंगन कड़े चूड़ियों से
उनके हाथ
लदे रहते
खानाबदोश स्त्रियां
दिन भर मेहनत करती
संाझ ढले
खुले आसमान तले
मिल जुलकर जुट जाती
चूल्हे चौके में
आग और
चांदनी
उनका सौंदर्य
किस कदर दमकता
नख शिख तक सजी संवरी
हाथी दांत लाख और कांच के कड़े चूड़ियां
नगीने दूधिया चांदनी में
झिममिलाते दमकते
खानाबददोश स्त्रियां
कलाईयों बाजूओं में
आकाकगंगाओं चांद तारों को
जगमग चूड़ियों कंगनों की तरह
पहने होती है ।
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अनमोल आँखे
जिनमें सपने
आकार लेते हैं
बचपन,जवानी,बुढ़ापा
ढेरों उम्मीदें
आँखों में मोतियों सा
पानीदार है जीवन
ये समन्दर है
महासागर है ज्वार-भाटे इनमें
छलकते प्योले
आंधी-तूफान
ताल तलैया झीलें झरने
अविरल बहती नदियां
सहज,सरल,सौम्य,सरस,अथाह
आशाएं संभावनाएं
जिन्दगी के घाट-घाट भटकते मिली
सूखें कुओं सी पथराई आँखे ।
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सुबह सबेरे
सूरज की पहली
किरण के साथ
पोटलियां चल पड़ी
रोटियां लिए
गिटिट्यां फोड़ने
पत्थरों को ढोने
खेतों को हांकने बखरने
इन्द्रधनुष को उतारती
लहराती उनकी
ओढ़नियां हवा में
जंगलों में झरना बन अपनी
हंसी से गुंजाती
दूर-दूर बिखर गई
पोटलियां ही पोटलियां
धरती से आसमान तक महकी
रोटियां ही रोटियां ।
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बिंदिया से शुरू होती...सुबह
सुबह उठते ही वहश्
आईने में अपनी बिंदिया को
निहारती है कहीं
इधर उधर तो नहीं हुई र्षोर्षो
हौले से उसे संवारती चिपकाती
ललाट पर
हो न हो बिंदिया जरूरी है...
केशर चंदन कुमकुम हल्दी
कुछ भी सही मिले न मिले
बिंदिया का कोई न कोई
विकल्प खोज लेती है
स्त्रियों की सबह सूरज से नहीं
बिंदिया से शुरू होती है ।
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करिश्मा,कालोल दिखना चाहती लड़की
करिश्मा,काजोल
उर्मिला दिखना चाहती
आज हर लड़की
मिलती जुलती हो सकती है
किसी की शक्ल
करिश्मा,काजोल
ऐश्वर्या से मिलती जुलती
हो सकती है आंखें
मुस्कराहट महिमा
सोचती है लड़की
हो न हो उसे रवीना
लगना ही चाहिए ।
कुछ नहीं तो मीना,टीना
हीना,ट्रिंक्कल
बबीता तो जरूर
लगना चाहिए उसे ।
जो है वह नहीं
दिखना चाहती लड़की ।
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स्वाद
समय के साथ
चीजों के मायने
अक्सर बदल जाते हैं
पत्थरों को रगड़ते घिसते
आदम को
समझ में आए थे
शाश्वत भूख में
स्वाद के भी मायने
समय के साथ
बदल गए
स्वाद रोटी की जगह
उतर आया
सिक्कों मे
नहीं जान सकता था आदम
मचेंगे कोहराम
छिडें़गे युद्ध
स्वाद की खातिर
उतर आएंगे विध्वंस पर ।
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खानाबदोश स्त्रियां
कलाई से बाजुओं तक
कंगन कड़े चूड़ियों से
उनके हाथ
लदे रहते
खानाबदोश स्त्रियां
दिन भर मेहनत करती
संाझ ढले
खुले आसमान तले
मिल जुलकर जुट जाती
चूल्हे चौके में
आग और
चांदनी
उनका सौंदर्य
किस कदर दमकता
नख शिख तक सजी संवरी
हाथी दांत लाख और कांच के कड़े चूड़ियां
नगीने दूधिया चांदनी में
झिममिलाते दमकते
खानाबददोश स्त्रियां
कलाईयों बाजूओं में
आकाकगंगाओं चांद तारों को
जगमग चूड़ियों कंगनों की तरह
पहने होती है ।
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