Saturday, April 10, 2010

कविताएं

मिनी बसें

चलो,रोशनपुरा,रंगमहल,लिली,विट्ठल,
हमीदिया,दस,ग्यारह,ग्यारहसौ
रोक्को...हां अम्मा जरा चढ़ना जल्दी जल्दी
संभल के बहनजी
चलो बढ़ाओ
आईए अंकल,बढ़ना मैडमजी,बाबूजी
खुल्ले निकालना...ये लेना बाकी के
मुन्ना बैठना,आंटीजी,भैया जी दबना
छंटाक-छंटाकभर
बच्चों को गोद में लेना जी
हां भैयाफटाफटा निकालना
रोक्को...रोक्को
झीलों से सजे नवाबों के इस ‘शहर में
घोड़ागाड़ी कहां अब
सवेरे से सांझ तक धड़धड़ाती दौड़ती
बड़ी-बड़ी व्यवस्थाओं के बीच वहां
अपनी ही ‘शान से
हर सबके को जोड़ती मिनी बसें ।
00
सबेरा होने पर
कहां कहां से निकल पड़ते दूर कहीं भी जूझते
दो जून की रोटी के लिए ये मेहनकश बेचारे
दिन भर की मेहनत के बाद दो घड़ी कहीं
नीन्द में उतरे ही थे कि रात गए
आततायी की बन्दूकों से धड़ाधड़
दाग दिए गए बेगुनाह कई
स्तब्ध आकाश चान्द भी चुप
पछी सहमे सहमे सोच रहे रात जागकर
सुबह में कैसे चहचहाएंगे वे और
खून से लथपथ इन बेगुनाहों से
कैसे कहेंगे चहचहा-चहचहाकर भई उठो भी
उठो उठो कि सवेरा हुआ ।

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