कुछ देर ठहर जाना चाहती हूं
मैं ठहर जाना चाहती हूं फूल-फूल महकने और
पराग की तरह बिखर-बिखर जाने के लिए
फुदकती गिलहरी के हाथों कहां-कहां तक मैं
बिखर जाना चाहती हूं दाना-दाना यहां-वहां
हर-हरा कर उग आना चाहती हूं फिर-फिर
घुल-घुल जाना चाहती हूं,फांगुनी चटख रंगों में
गेन्दा,टेसू,पीली-पीली सरसों में और
खिल-खिल जाना चाहती हूं कहीं भी
उन मैले-कुचैले बदरंग चेहरों में जो
जिन्दगी की परवाह किए बगैर हर वक्त
कचरे के बदबूदार ढेरों को खंगालते रहते
कुछ मिल ना मिले कभी मुरझाते नहीं जुटे रहते
धूल भरे खिल-खिलाते कोपनहेगन को ठेंगा दिखलाते
इन चेहरों पर
बूंद भर पसीने की तरह कुछ देर
ठहर जाना चाहती हूं ।
नाव
सदियों से तुम्हारी खिलखिलाहट हूं मैं
चप्पू के इशारों पर चलती फकत मूक
नाव नहीं हूं कल-कल बहती हुई रूपसी नदी
उदास मत होना
तुम्हारे चेहरे की चिरयुवा
मुस्कान हूं मैं नाव
हर पल तैरती रहती हूं लहर-लहर पर
सदियों से मांझी ने कोरस में गुनगुनाया मुझे ही
गाथाएं सुनाते इन किनारों के बीच बहती
लहर-लहर पर थिरकती
तुम्हारे चेहरे की जीवन्त जादुई
मुस्कान हूं नदी मुझे उदास कर देती है
तुम्हारा सूख जाना जैसे
स्त्री का बूढ़ा जाना और उसके
टूटे दांत की तरह कहीं बदहाल
पड़ी रह जाती हूं मै फकत काठ की नाव नहीं हूं
लहर-लहर लहराती नदी
मै तुम्हारा चेहरा हूं,अभिव्यक्ति हूं,बयान हूं
सदियों से तुम्हारी खिलखिलाहट हूं कल-कल गूंजती
तुम्हारे लहरों पर
तैरती मुस्कान मैं नाव हूं ।
पर्व स्नान
कई सारी नदियों का
पवित्र जल मां ने
शीशियों-बाटलों में
सहेज रखा है
बुढ़ापे से विवश हब वे पर्वों पर
कहीं तीर्थों,सरोवरों,नदियों,संगमों तक अक्सर
जा नहीं पाती ऐसे में घर पर ही
बाल्टी के पानी में ढंकना भर पवित्र जल यूं
उढ़ेल लिया करती है उन्हें भरोसा है कि उनके लिए
गंगा,यमुना,गोमती,गोदावरी,बेतवा,पारवती,क्षिप्रा,
नर्मदा,कांवेरी,सरस्वती,आवाहन करते ही
नदियां सबकी सब दौड़ी चली आएगी बाल्टी में ।
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मित्रता
शाख-शाख कटीला बेर
फलों से लटालूम रहता
स्वस्तुति में सदैव इतराता रहता हर कभी
मैं तुमसे ज्यादा घना और फलदार इतना किक देखो
शाख-शाख झुकी जा रही
सीताफल बेहद विनम्रता से समझाता है कि मित्र
सुनो तो,
मेरा एक ही फल अत्यन्त तृप्तिदायक रहता है
मिठास से भरा सीताफल जो खाए तो
खाता ही रह जाए कुदरत का लडड्ू गोल-मटोल सा
तुम्हारे खटास भरे बेर फल प्रशंसित तो कभी-कभार
यदा-कदा ही होते है और ये
तुम्हारी कष्टदायक कटीली शाखें फैलाते ही कई बार
बैरहमी से काट दी जाती है
इनके अनगिनत सारे इतने
ये कांटे खुद तो बच जाते हैं लोगों से पर
मेर भाई फलों को तोड़ने
पत्थर तुम्ही खिलवाते
यह तुम्हारी दुर्दशा देखी नहीं जाती
इतना सब सुनते ही बेर सोच में डूब गया कि
यह वाकई में मुझसे
सच ही तो कह रहा है तभी सीताफल आत्मीयता से
मीठी मुस्कान बिखेरते हुए समझाता है कि मित्र
तुम जैसे भी हो मेरे प्रिय हो,और कभी भी
मित्रता में ना तो कांटे गिनना चाहिए,ना ही
फल अथवा प्रतिफलमित्रता ऐसी ही शाश्वत होती है ।
Wednesday, February 24, 2010
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