Friday, December 11, 2009

सीपियां

सीपियों सी
अनमोल आँखे
जिनमें सपने
आकार लेते हैं
बचपन,जवानी,बुढ़ापा
ढेरों उम्मीदें
आँखों में मोतियों सा
पानीदार है जीवन
ये समन्दर है
महासागर है ज्वार-भाटे इनमें
छलकते प्योले
आंधी-तूफान
ताल तलैया झीलें झरने
अविरल बहती नदियां
सहज,सरल,सौम्य,सरस,अथाह
आशाएं संभावनाएं
जिन्दगी के घाट-घाट भटकते मिली
सूखें कुओं सी पथराई आँखे ।
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सुबह सबेरे

सूरज की पहली
किरण के साथ
पोटलियां चल पड़ी
रोटियां लिए
गिटिट्यां फोड़ने
पत्थरों को ढोने
खेतों को हांकने बखरने

इन्द्रधनुष को उतारती
लहराती उनकी
ओढ़नियां हवा में
जंगलों में झरना बन अपनी
हंसी से गुंजाती
दूर-दूर बिखर गई
पोटलियां ही पोटलियां
धरती से आसमान तक महकी
रोटियां ही रोटियां ।
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बिंदिया से शुरू होती...सुबह

सुबह उठते ही वहश्
आईने में अपनी बिंदिया को
निहारती है कहीं
इधर उधर तो नहीं हुई र्षोर्षो
हौले से उसे संवारती चिपकाती
ललाट पर
हो न हो बिंदिया जरूरी है...
केशर चंदन कुमकुम हल्दी
कुछ भी सही मिले न मिले
बिंदिया का कोई न कोई
विकल्प खोज लेती है
स्त्रियों की सबह सूरज से नहीं
बिंदिया से शुरू होती है ।
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करिश्मा,कालोल दिखना चाहती लड़की

करिश्मा,काजोल
उर्मिला दिखना चाहती
आज हर लड़की
मिलती जुलती हो सकती है
किसी की शक्ल
करिश्मा,काजोल
ऐश्वर्या से मिलती जुलती
हो सकती है आंखें
मुस्कराहट महिमा
सोचती है लड़की
हो न हो उसे रवीना
लगना ही चाहिए ।
कुछ नहीं तो मीना,टीना
हीना,ट्रिंक्कल
बबीता तो जरूर
लगना चाहिए उसे ।
जो है वह नहीं
दिखना चाहती लड़की ।
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स्वाद
समय के साथ
चीजों के मायने
अक्सर बदल जाते हैं
पत्थरों को रगड़ते घिसते
आदम को
समझ में आए थे
शाश्वत भूख में
स्वाद के भी मायने
समय के साथ
बदल गए
स्वाद रोटी की जगह
उतर आया
सिक्कों मे
नहीं जान सकता था आदम
मचेंगे कोहराम
छिडें़गे युद्ध
स्वाद की खातिर
उतर आएंगे विध्वंस पर ।
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खानाबदोश स्त्रियां
कलाई से बाजुओं तक
कंगन कड़े चूड़ियों से
उनके हाथ
लदे रहते
खानाबदोश स्त्रियां
दिन भर मेहनत करती
संाझ ढले
खुले आसमान तले
मिल जुलकर जुट जाती
चूल्हे चौके में
आग और
चांदनी
उनका सौंदर्य
किस कदर दमकता
नख शिख तक सजी संवरी
हाथी दांत लाख और कांच के कड़े चूड़ियां
नगीने दूधिया चांदनी में
झिममिलाते दमकते
खानाबददोश स्त्रियां
कलाईयों बाजूओं में
आकाकगंगाओं चांद तारों को
जगमग चूड़ियों कंगनों की तरह
पहने होती है ।
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Sunday, November 29, 2009

क्वार में

क्वार में लगते ही दादी गांव का
कच्चा घर लीपने छाबने को किस कदर
भिड़ जाया करती थी
उतावली इतनी कि घर भर में से
किसी की बाट जोहे बगैर अकेले ही
मोटे मोटे लदेडे,फोड़ेती लीपणा,छाबती लीपती
बामुश्किल
निसरनी पर चढे भीतें,चांद्या छाबती लीपती
सबसे पहले वह रादणी लीपती फिर कोठरी
परेण्डीवाली और गलियारे के बाद बैठक
अंधेरी ओसरी,तुलसीक्यारी,आंगन
ढोरकोठा,ओटला ओटली लीपणे से महक उठते थे
सब छाव लीपकर वहां चोक पूरती,अक्षत चढ़ाती
दीया जलाती तब कहीं दादी
फुर्सत में नास्का सूंघते बतियाने
बाखल में जा बैठती
जमाना हुआ दादी को गुजरे साथ ही कच्चे घरों
छाबने लीपने का दौर भी नदारद हुआ अब
बाखल ही नहीं गांव भर में चूना सीमेन्ट
ईटों वाले घर है जिनमें रहते हुए हमें
पता ही नहीं चलता कभी का लग चुका
हीना क्वार का
o

शब्द और भाषा के पहले

मैं कई बार
यही सोचती हूं कि
सृष्टि में जब पहली
बार मिले होंगे
आदम और हव्वा तो
कैसे उन्होंने
बगैर शब्दों
बगैर भाषा
एक दूसरे को समझाए होंगे अपने सुख देख और
किस कदर
वे दौनों
चकित हुए होंगे
चांद तारों झरनों पहाड़ो आसमान में
इन्द्रधनुषी रंगों को देखकर वे झूम उठे होंगे
मंजर कई सारे और भी देखें होंगे उन्होंने साथ साथ
मसलन,शाख से
पत्ते का टूटना
कोंपल का लहलहाना इनमें
महसूस किया होगा जीवन को
बगैर शब्द बगैर भाषा वे
परिभाषित करते रहे अपना युग
हमसे बेहतर युग में थे आदम और हव्वा
हमारे पास
शब्द,भाषा,समझ,सोच,सबकुछ फिर भी
क्यों इतना कठिन है
जीवन
समय और आज का
आदमी
सोचती हूं निःशब्द हो जाती हूं
कई कई बार मैं इतनी सी
इसी बात पर
oo
घोंसला

सांझ होते ही वह बंया
जिसके लिए लौट रही है
उसे वहां नहीं पाया तो
कितनk रोएगी वह
कहां कहां नहीं भटकेगी
मारे डर के इधर उधर
सर छुपाने लायक हमारी तरह वे भी
ज़रा सी जगह
कितनी मेहनत से
बनाया करते हैं
अपने ड्राइंग रूम में सजाने हम है कि
उनके घोंसले उठा लाया करते हैं ।
oo